Monday, 22 August 2016


माँ

                                                                           
माँ


भाव भरा है मातृ दिल, बहता जैसे नीर
देख कष्ट संतान के, माता हुई अधीर

पशु पक्षी इन्सान में, माँ हैं एक समान
सबसे पहले सोचती, बच्चे उनकी जान

चिड़िया चुगती चोंच से, मिला चोंच से चोंच
माँ लाती चुन कर सकल, दाने है आलोच

कभी कहीं खतरा नहीं, जब माँ होती पास 
बच्चे इसको जानते, करते हैं अहसास

धन्य धन्य मायें सभी, धन्य सभी संतान
करती रक्षा प्रेम से, पक्षी या इन्सान

माता है सबसे बड़ी, दूजा हैं भगवान
शीश झुका आशीष लो, कर माँ का सम्मान 

©कालीपद ‘प्रसाद

Sunday, 21 August 2016

दोहे



मौसम है बरसात का, मच्छर के अनुकूल
डेंगू और मलेरिया , गन्दी नाली-कूल     
मसक भगाने वास्ते, उत्तम पत्ती नीम   
जलाओ इसे शाम को, नीम का गुण असीम 
छत की टंकी साफ़ हो, घर में पहुँचे धूप
बचने दोनों मर्ज से, करो कुछ दौड़–धूप 
राग द्वेष सब दूर हैं, मन जब होता शांत  
मन वश होता योग से, यही योग सिद्धांत |

© कालीपद ‘प्रसाद’

Wednesday, 17 August 2016

आज़ादी कैसे मनाएँ


हम अपनी आज़ादी का जश्न, बोलो अब कैसे मनाएँ
अमर शहीदों के बलिदान की, गाथा किसको सुनाएँ ?

भूखे रहे, गोली खाए वे, लड़ते लड़ते सब शहीद हुए
मजबूत आंग्ल डंडा भी, हौसला वीरों का तोड़ न पाये |
गोरे अंग्रेज तो चले गए, काले अंग्रेज को कौन भगाएँ
हम अपनी...

जालियाँवाला बाग़ को देखा, देखा नोआखाली के दंगे
साजिश थी सब विदेशी राज की, जात के थे वे फिरंगे
दलित-मुस्लिम पर क्रूरता कर, चरम पंथी कैसे इतराएँ
हम अपनी ...

हर चौथा आदमी भूखा है, करोडपति संसद में बैठे है
हर चौथा सांसद पर, भ्रष्टाचार का संगीन आरोप है
निराशा में डूबे देश में, आशा की ज्योति कौन जलाएँ
हम अपनी ...

हर पार्टी है निजी कम्पनी, अध्यक्ष का है मालिकाना हक़
कभी बाप, कभी बेटा, बीबी कभी, खानदान है अधिग्राहक
कम्पनी संभाले या देश संभाले, कौन इनको बतलाएँ
हम अपनी ....

हमारा देश अव्वल है, विश्व के सब देशों की सूचि में
किन्तु खेद है, अव्वल है यह, भ्रष्ट देशों की सूचि में
खेल ना जाने खेल के अध्यक्ष, मशाल कैसे जलाएँ
हम अपनी ...
गरीब को नहीं भरपेट भोजन, सड़ता है सब खाद्यान्न
करोड़ों टन की होती बर्बादी, है यह अकुशल प्रबंधन
भूख और कुपोषण के शिकार, किसके आगे गिढ़गिढ़ायें
हम अपनी ...
© कालीपद ‘प्रसाद’



Sunday, 14 August 2016

दोहे

दोहे !

भारत में हर मास में, होता इक त्यौहार
केवल सावन मास है, पर्वों से भरमार |1|
रस्सी बांधे साख में, झूला झूले नार
रिमझिम रिमझिम वृष्टि में, है आनन्द अपार |२|
जितने हैं गहने सभी, पहन कर अलंकार
साथ हरी सब चूड़ियाँ, बहू करे श्रृंगार |३|
काजल बिन्दी साड़ियाँ, माथे का सिन्दूर
और देश में ये नहीं, सब हैं इन से दूर |४|
कभी तेज धीरे कभी, कभी मूसलाधार
सावन में लगती झड़ी, घर द्वार अन्धकार |५|
दीखता रवि कभी कभी, जब है सावन मास
बहुत नहीं है रौशनी, मिलता नहीं उजास |६|


© कालीपद .’प्रसाद’

दोहे

दोहे !

भारत में हर मास में, होता इक त्यौहार
केवल सावन मास है, पर्वों से भरमार |1|
रस्सी बांधे साख में, झूला झूले नार
रिमझिम रिमझिम वृष्टि में, है आनन्द अपार |२|
जितने हैं गहने सभी, पहन कर अलंकार
साथ हरी सब चूड़ियाँ, बहू करे श्रृंगार |३|
काजल बिन्दी साड़ियाँ, माथे का सिन्दूर
और देश में ये नहीं, सब हैं इन से दूर |४|
कभी तेज धीरे कभी, कभी मूसलाधार
सावन में लगती झड़ी, घर द्वार अन्धकार |५|
दीखता रवि कभी कभी, जब है सावन मास
बहुत नहीं है रौशनी, मिलता नहीं उजास |६|


© कालीपद .’प्रसाद’

Thursday, 11 August 2016

नव गीत


आपसी झगडा भूलकर बोलो, भारत एक परिवार है
एक स्वर में बोलो सभी, कश्मीर पूरा हमारा है |
अलग अलग हैं रहन सहन, अलग अलग है भाषा
अलग अलग खान पान हैं, अलग अलग वेश भूषा
मज़हब का कोई बंदिश नहीं, इबादत की आजादी है
विविधता में एकता है, यही हमारी अंतर्धारा है |
आपसी झगडा भूलकर बोलो, भारत एक परिवार है
एक स्वर में बोलो सभी, कश्मीर पूरा हमारा है |
पाक का नापाक मंशा को, होने ना देंगे सफल
आतंकी की हर कोशिश, हम कर देंगे बिफल
अलगाववादी हो सावधान, मन में तुम्हारे अँधेरा है
पाक पर ना करो विश्वास, वह तो अध्-मारा है |
आपसी झगडा भूलकर बोलो, भारत एक परिवार है
एक स्वर में बोलो सभी, कश्मीर पूरा हमारा है |
भारत के रहनुमाओं सुनो, ऐसा करो कुछ देश वास्ते
होगी शांति देश में गर, रंजिश मिटेगी आस्ते आस्ते
हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, ईसाई, संस्कृति की चौ-धारा हैं
सब मिले भारत में जैसे, सागर में मिले बहु धारा हैं |
आपसी झगडा भूलकर बोलो, भारत एक परिवार है
एक स्वर में बोलो सभी, कश्मीर पूरा हमारा है |


© कालीपद ‘प्रसाद’

Friday, 29 July 2016

                                                               



                                                                     
गुगल से साभार 




               इन्सान स्वार्थ में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई कर रहे हैं जिससे वातावरण में प्राण बायु की कमी तो हो ही रही है साथ में मौसम भी अनियमित होने लगा है | समय परवर्षा न होना, आंधीतूफान, अधिकगरमी, अधिक ठण्डा होना सब प्रकृति में असंतुलन के कारण हो रहा है| इन्सान अपना शौक पूरा करने के पौधों को बोनसाई बनाकर गमले में लगा लिया है| ऐसा ही एक बन्साई पौधा इन्सान को कह रहा है--

युगों युगों से देते आये हैं
जीवन वायु तुम्हे ,
किन्तु मानव ! तुम अकृतग्य हो
कभी नहीं समझे हमें |
था मस्तक हमारा इतना ऊँचा
मानो, चाहते नभ को छूना
काट छाँट कर हमें तुमने
बना दिया पेड़ छोटा बौना |
उखाड़ कर रख लिया हाथ में
चाहते हो क्या दिखाना ?
हम न जिन्दा रहेंगे तो
मुश्किल होगा तुम्हारा जीना |
मानव हो ! समझो तुम
दानव जैसा काम न करो,
किया जो किया, भूल जाओ
हरदिन अब पेड़ का सेवा करो |
काटो ना एक भी पेड़ अब
जंगल का संरक्षण करो
वनस्पति ही जीवन का आधार है
उसका सदा संवर्धन करो |

कालीपद ‘प्रसाद’

Saturday, 23 July 2016

ग़ज़ल/गीतिका

उस ने सोचा सही आदमी की तरह
भावना से भरा दिल नदी की तरह  |

हर समर जीतना, है नहीं लाज़मी
मैं न माना है, बेचारगी की तरह |

अडचनों से कभी, हम डरे ही नहीं
हम ने देखा नहीं, जिंदगी की तरह|

इंतजारों  के पल तो, गुज़रता नहीं
हर घडी बीतती, चौजुगी की तरह |

होती वर्षा कभी, मूसलाधार भी
नाली बहती है क्रोधी, नदी की तरह |

दौड़ के होड़ में, था वही अप्रतिम
तेज भागा वही, बारगी की तरह |

बारगी – घोड़ा
कालीपद 'प्रसाद'