Sunday, 5 February 2017

एक ग़ज़ल

इस जीस्त से निराश हूँ मैं, यार क्या करूँ
कुछ भी तो सूझता है नहीं, प्यार क्या करूँ |
हमको निभाना प्यार तो, इकरार क्या करूँ
उत्सर्ग जिंदगी है तो, इज़हार क्या करूँ |
ये जीस्त भी अजीब है, इज्ज़त मिली नहीं
खाया हूँ डांट,चोट, तिरस्कार, क्या करूँ |
हर बात दोस्त मानता, जोरू जो बोलती
इस भीरु दोस्त से मैं क्या तकरार करूँ |
माँगे बिना मिला नहीं कुछ भी यहाँ कभी
ये प्यार जो तुम्हारा है, इनकार क्या करूँ |
है नाव जिंदगी का रहा तैरता मगर
कश्ती तो डगमगा रही मझधार, क्या करूँ |
यह तोहफा अनूठा है, थोड़ा डरावना
लड़ना तो जानता नहीं, तलवार क्या करूँ |
आना है हमको और यहाँ, रहना नहीं कभी
जग-हाट में दुकान का विस्तार क्या करूँ |
खोटी नसीब है मेरी, अब क्या कहूँ तुझे
पाना तुझे तमन्ना थी, उपहार क्या करूँ |
जब फ़र्ज़  ही नसीब है, अधिकार तो नहीं
यह जिंदगी तुम्हारी है, उपकार क्या करूँ ||
© कालीपद’प्रसाद’
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Tuesday, 31 January 2017

हे राम जी ! सुनो

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एक बार फिर राम जी,तारो नैया पार |
यू पी में सरकार हो, मंदिर हो तैयार ||
झूठ नहीं हम बोलते, पार्टीहै मजबूर |
हमें करो विजयी अगर,बाधा होगी दूर ||
जाति धर्म सब कट गया, वजह सुप्रीम कोर्ट|
आधार कुछ बचा नहीं, कैसे मांगे वोट ||
तुम ही हो मातापिता, बंधू भ्राता यार |
साम दाम या भेद हो,ले जाओ उस पार ||
मंदिर ज़िंदा जीत है, मृत मुद्दा है हार |
राम राम जपते रहो,होगा बेड़ा पार ||
© कालीपद ‘प्रसाद’

Saturday, 28 January 2017

ग़ज़ल

सादगी है भली जिंदगी के लिये
तीरगी फैली है रौशनी के लिये ।
बेवफाई नही पत्नियों से कभी
फायदा है वफा, आदमी के लिये ।
क्या कहूँ क्या लिखूँ सब रहा अनकहा
शब्द पूरा नही शायरी के लिये ।
चाह है कोइ भी काम हो खुद करूँ
ज्ञान तो है नही नौकरी के लिये ।
मुस्कुराना पड़ा, खिल्खिलाना पड़ा
ए सभी खोखला दिल्लगी के लिये ।
वोट पाये सभी, मुफ्लिसो से सदा
कुछ करो फायदा, मुफ्लिसी के लिये ।
© कालीपद ‘प्रसाद

Saturday, 21 January 2017

ग़ज़ल





नंदन प्यारा था दुलारा था, सहारा न हुआ
मेरा खुद का ही जलाया दिया अपना न हुआ |

रौशनी फ़ैल गयी चारो तरफ लेकिन फिर
घर अँधेरा था अँधेरा है उजाला न हुआ |

देखते रह गए बेसुध नसे में मदिरा बिना  
चाह कर भी उन्हें फ़रियाद सुनाना न हुआ |

दिल नहीं तुझको दिखा सकता जलाया तू ने
ख़ाक में मिल गया वो छार किसी का न हुआ |

निकले थे वज्म से बेआबरू होकर कभी वो
बेरुखी तेरी वजह थी कि दिवाना न हुआ |

सिर्फ मैं ही नहीं, हर एक दिवाना जो बना    
दर्द तुमने दिया उसको तो भुलाना न हुआ |

याद करते थे सभी तुझको, दुलारी थी तू
दिल का अरमान हमारा कभी पूरा न हुआ |

कालीपद ‘प्रसाद’

Friday, 13 January 2017

ग़ज़ल




हमने जब वादा किया तो मुस्कुरा देने लगे
दोस्ती में वो मुझे इक तोहफा देने लगे |

इस जमाने के दिए झटके सभी हमने सहा
जख्म जो तुमने दिया था, बेदना देने लगे |

कार बस के काफिले से ध्वस्त यातायात जब
बंद रस्ते खोल रक्षी रास्ता देने लगे |

हादसा के पीडितों ने तो गँवाया जान खुद
फायदा क्या प्रतिकरण जो दूगुना देने लगे |
 
शत्रु है दिनमान सबके, जुगनू हो या चिराग
शुर्मयी निशि को चिरागें जगमगा देने लगे |

दोस्ती अच्छी अगर है तो ज़माना आपका
मैं हुआ बेचैन यारा हौसला देने लगे  |


कालीपद ‘प्रसाद’

Friday, 6 January 2017

ग़ज़ल

काले बादल से हवा में भी नमी लगती है |
दिल के रोने से ये आँखे भी गिली लगती है ||

रजनी के आँसू से धरती ने बुझाया है प्यास|
पाँव रखता हूँ तो हलकी सी नमी लगती है||

यह सियासत भी बड़ी बेवफा है, हरदम धूर्त |
ना पिता की हुयी ना पति की,कटी लगती है ||

इस तन्हाई में तेरी याद हमेशा आई |
क्या करूँ मैं ये फिजायें भी लुटी लगती है ||

दीप की रोशनी से धरती चमकती है जब |
धरती की साडी तो हीरे ही जड़ी लगती है  ||

ढक गई है धरा पत्तों की हरी चादर से |
रूप में वह नई दुल्हन से भली लगती है ||


© कालीपद ‘प्रसाद’

Thursday, 5 January 2017

ग़ज़ल

खुशबू नहीं शबाब नहीं अब गुलाब में
कैसे कहूँ कशिश भी नहीं अब शराब में |
काली घटा गरफ्त किया सूर्य रौशनी
वो तीक्ष्णता चुभन भी नहीं आबताब में |
जीवन कभी सुसाध्य नहीं, इक रहस्य है
इंसान मोह में सदा जीते सराब में |
बचपन यहीं कहीं खो गया, ढूंढने लगा
मैंदान में नहीं, मिला उसकी किताब में |
यदि कर्म पूजा है तो अलग पूजा क्या करे
होनी विलीन आदमी के ही सवाब में |
कितने सफ़ेद कितनी है काली मुद्रा चलन
अब कौन है यहाँ जो कहेगा हिसाब में |
नेता कहे भी तो कहे क्या जनता को पत|
श्रद्धया नहीं किसी को भी झूठे जवाब में |
शबाब-लालिमा ; सराब -मृगमरीचिका
सवाब -पूण्य कर्म
कालीपद ‘प्रसाद’