Wednesday, 16 August 2017

संकल्प से सिद्धि (गीत)

संकल्प से सिद्धि’ (गीत)
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, भारतवर्ष में सफल हो |
दुआ करो सब देश वासियों, भारत सबसे निर्मल हो ||(टेक )
१ 
सुविधा छोड़े नेता अपना, गाँधी जी का मार्ग चुने
गरीब को रखकर ज़मीर में, फंदा योजना का बुने
मतदाता की सुने आवाज़, बंद मार काट दंगल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा,......

घूसखोरी, धोखाधड़ी सभी, दफ्तरों में अब बंद हो
मंत्री से संत्री तक अब सब, ईमान का आदर्श हो
मुफलिस करोडपति व्यापारी, ईमां उसका अविचल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, .......

घोटाला काला बाजारी, ईमान को खा रहा है
भ्रष्टाचार मुनाफाखोरी, ज़मीर को बेच रहा है
समाप्त हो सारे बुराइयाँ, तो भारत का मंगल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा,......
,

बाहुबल, धनबल का क्या काम, जब स्वच्छ होगा जनतंत्र
ईमान से लडे चुनाव सब, ईमान ही हो सबके मंत्र
बेईमानी छोड़े सब अब, सबका चरित्र सुविमल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, ..........
|

स्वच्छ सजीला भारत सारा, गन्दगी का नाम न रहे
सौचालय हर घर में होवे, ये बात सदा याद रहे
कूड़ेदान में कूड़े गिरे, घर बाहर सभी विमल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा,......

जात-पात सम्प्रदाय समूह, दकियानूसी कट्टरपन
समूल समाप्त करना सबको, जन जन में हो अपनापन
ख़त्म बुराई मानस से हो, सब जीवन सहज सरल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, ........

हर हाथ के लिए काम मिले, भूख से न हो अब मौतें
हर सर के लिए एक छत हो, सड़क पर न रैन बीते
लोक कल्याण काम में सदा, ईमान कभी ना दुर्बल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, ........|

संचार संपन्न सभी गाँव, सड़कों का हो निर्माण
परिपक्व होगा भारत देश, गावों का बढ़ेगा मान
ग्रामीण को सब प्रभुत्व, जंगल उनका अंचल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, .........
|

शिक्षा का हो प्रचार प्रसार, विद्यालय हो गावों में
दंड मिले उन व्यापारी को, जुड़े विद्या व्यापार में
“प्रसाद’ सब हो ईमानदार, काला धन अब न धवल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा,
१०
आज़ादी की हीरक जुबली, सब मिलकर जश्न मनाएं
पिछड़ गए जो दोस्त हमारे, हाथ पकड आगे लायें
ह्रदय कमल सब खिलकर महके, सब जनता का मंगल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, भारतवर्ष में सफल हो |
दुआ करो सब देश वासियों, भारत सबसे निर्मल हो |
कालीपद ‘प्रसाद’
16/08/2017

Monday, 24 July 2017

दोहे

मानव जीवन में सदा, कोशिश अच्छा कर्म |
मात पिता सेवा यहाँ, सदा श्रेष्ट है धर्म ||
प्रारब्ध नहीं, कर्म है, भाग्य बनाता कर्म |
पाप पुण्य होता नहीं, जान कर्म का मर्म ||
छुएगा आग हाथ से, क्या होगा अंजाम |
सभी कर्म फल भोगते, पाप पुण्य का नाम ||
बुरा काम का जो असर, उसे जान तू पाप |
है पुण्य नेक कर्म फल, करे दूर संताप ||
कालीपद 'प्रसाद'

Monday, 17 July 2017

गीतिका


न जानूँ मैं बताऊँ कैसे’, मन में जो दबाई है
जबां पर यह नहीं आती, मे’रे खूँ में समाई है |
नहीं था जीस्त में आराम, शाही खानदानों ज्यो
निभाया मैं प्रतिश्रुति और तुमने भी निभाई है |
अभी तुझको कहूँ क्या, तू बता क्यों बे-वफाई की
तेरी झूठी मुहब्बत में, प्रतिष्ठा सब जलाई है |
जनम भर हम रहेंगे साथ, वादा तो तुम्हारा था
अकेला छोड़ कर मुझको, बहुत तुमने रुलायी है |
दिखाती प्यार बेहद थी सदा, पर छोड़ी’ क्यों अब हाथ
बिना बोले चले जाना, यही तेरी बुराई है |
सदा तुम खेलती थी, गेंद बेचारा मेरा दिल था
मुहब्बत के वो’ खेलों में, वफ़ा तुमने भुलाई है |
गज़ब नाराजगी तेरी, उफनती वो पयस जैसा
हो’ जाती शांत जब, लगती है’ तू मीठी मलाई है |
कालीपद 'प्रसाद'

Wednesday, 5 July 2017

ग़ज़ल

जहाज़ चाहिए’ तूफानी’ बेकराँ^ के लिए
विशिष्ट गुण सभी, जी एस* इम्तिहाँ के लिए|

है’ कायदा यहाँ धरती के’ आदमी वास्ते
नहीं नियम को’ई’ भी जंद आसमाँ के लिए |

अवाम डरते’ थे’ तब लाल आँख को देखकर
समाप्त डर हुआ मिज़्गाँ-ए-खूँशियाँ@ के लिए |

महुष्य जाति यहाँ, आते’ चार दिन वास्ते  
न राम कृष्ण बने उम्रे जाविदाँ # के लिए |

यहीं पले यहीं खाते स्तवन करे पाक की
सज़ा क्या’ इन छली गद्दार राजदाँ के लिए |

शब्दार्थ : बेकराँ= कुल किनारा हीन समुद्र
जी एस= GST
मिज़्गाँ-ए-खूँशियाँ@= रक्त रंजित लाल पलकें
उम्रे जाविदां#=शाश्वत जीवन
जंद =बड़ा,विशाल,महान

कालीपद 'प्रसाद'




Friday, 30 June 2017

उपन्यास "कल्याणी माँ"

एक खुश खबर !
प्रिय मित्रो , आपको यह खुश खबर देते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि मेरा उपन्यास "कल्याणी माँ' प्रकाशित हो चुका है और amazon.in and flipkart.com में उपलब्ध है | इसका लिंक नीचे दे रहा हूँ | गाँव की एक गरीब स्त्री जिसने सदियों पुरानी परम्पराओं को तोड़कर नई राह बनाई ,और लोगो की प्रेरणा बन गई ,उसकी कहानी एकबार जरुर पढ़िए | मुझे विश्वास है कि कभी आप उसके साथ हँसेंगे तो कभी उसके साथ रोयेंगे |
http://www.bookstore.onlinegatha.com/boo…/…/Kalyani-Maa.html



कालीपद 'प्रसाद'

Tuesday, 20 June 2017

दोहे

दोहे ( दार्जिलिंग पर )
बेकाबू पर्वत हुए, प्रश्न बहुत है गूढ़
हिंसा से ना हल मिले, मसला है संरूढ़ |

स्वार्थ लिप्त सब रहनुमा, प्रजागण परेशान
जनता का हित हो न हो, उनकी चली दूकान |


दोहे (रिश्तों पर )
यह रिश्ता है एक पुल, मानव है दो छोर
व्यक्ति व्यक्ति से जोड़ते, इंसान ले बटोर |

रिश्ते में गर टूट है, समझो पुल बेकार
टूटा पुल जुड़ता नहीं, नागवार संसार | 

कालीपद प्रसाद'

Friday, 16 June 2017

अतुकांत कविता

जीवन क्या है ?
वैज्ञानिक, संत साधु
ऋषि मुनि, सबने की
समझने की कोशिश |

अपनी अपनी वुद्धि की
सबने ली परीक्षा
फिर इस जीवन को
परिभाषित करने की,
की भरषक कोशिश |

किसी ने कहा,’मृग मरीचिका’
कोई इसे समझा “समझौता’
किसी ने कहा, “ भूलभुलैया”
“हमें पता नहीं, कहाँ से आये हैं
किस रास्ते आये हैं
किस रास्ते जाना है
यह भी पता नहीं
कहाँ जाना है |
जिसे हम देख रहे हैं, झूठ है
जो नहीं देख पा रहे हैं वो सच है |
बड़े बड़े साधू संत
वाइज और पादरी
का जवाब भी
एक नया भूलभुलैया है |

कई खंड काव्य
और महाकाव्य
लिखे गए है
इस भूलभुलैया पर |
किन्तु
सबके दिखाए गए मार्ग
अन्धकार के चिरकालीन
बंद दरवाज़े के पास जाकर
अंधकार में विलीन हो गए |  


कालीपद 'प्रसाद'

Wednesday, 14 June 2017

ग़ज़ल

दिल मिले या न मिले, हाथ मिलाते रहिये
प्यार हो या न हो’ पर, आँख चुराते रहिये |
पाक बंकर की’ कहानी को’ सुनाते रहिये
कागजों पर उन्हें’ जंगों में’ हराते रहिये |
पांच के बाद अभी और भी’ सर ले तो क्या
देश की जनता’ को’ उपदेश सुनाते रहिये |
काश्मीरों की’ कहानी है’ सभी को मालुम
दोगली नीति वजह देश जलाते रहिये |
कुछ न सूझे तो’ मनोभाव को’ भड़का कर तब
धर्म के नाम से’ उत्पात मचाते रहिये |
वोट देकर अभी’ सबको हो’ रहा पछतावा
आपसी स्वार्थ में’ पकवान पकाते रहिये |
मर भले जाय बिना अन्न गरीब ओ मजदूर
आप तो श्वान को’ ही गोस्त खिलाते रहिये |
मिथ्या भाषण करे’ औ गाल बजाए ‘काली’
झूठ का सच बना’ जनता को’ बताते रहिये |
कालीपद 'प्रसाद'

Sunday, 11 June 2017

ग़ज़ल

एक तर्ही ग़ज़ल
न उत्कंठा, न हो हिम्मत, नया क्या
न हो ज़ोखिम तो’ जीने का मज़ा क्या ?
चुनावी पेशगी में चीज़ क्या क्या
पुराने नोट अब भी कुछ बचा क्या ?
महरबानी ते’री झूठी ही’ लगती
है’ तू शातिर शिकायत या गिला क्या ?
निगाहें तेरी’ क़ातिल बेरहम किन्तु
बिना ये क़त्ल, मुहब्बत का नशा क्या ?
गज़ब का उसका’ चलना बोलना
इबारत क्या इशारत क्या अदा क्या ? ( गिरह )
कालीपद 'प्रसाद'

Tuesday, 6 June 2017

सरस्वती वन्दना (कुण्डलिया छंद में )




वर दे मुझको शारदे, कर विद्या का दान
तेरे ही वरदान से, लोग बने विद्वान
लोग बने विद्वान, आदर सम्मान पाये
तेरे कृपा विहीन, विद्वान ना कहलाये
विनती करे ‘प्रसाद’, मधुर संगीत गीत भर   
भाषा विचार ज्ञान, विज्ञानं का मुझे दे वर |
कालीपद ‘प्रसाद

Monday, 5 June 2017

विश्व पर्यावरण दिवस पर पांच दोहे

भावी पीढ़ी चाहती, आस पास हो स्वच्छ
पूरा भारत स्वच्छ हो, अरुणाचल से कच्छ |

हवा नीर सब स्वच्छ हो, मिटटी हो निर्दोष
अग्नि और आकाश भी, करे आत्म आघोष |* (खुद की शुद्धता की घोषणा उच्च स्वर में करे )

नदी पेड़ सब बादियाँ, विचरण करते शेर
हिरण सिंह वृक तेंदुआ, जंगल भरा बटेर |

पाखी का कलरव जहाँ, करते नृत्य मयूर
निहार अनुपम दृश्य को, मदहोश हुआ ऊर |


समुद्र की लहरें उठी, छूना चाहे चाँद
खूबसूरती सृष्टि की, भाव रूप आबाद |
कालीपद 'प्रसाद'

Tuesday, 16 May 2017

ग़ज़ल

मीना–ए-मय में’ मस्त सहारा शराब है
गुज़र गया है’ वक्त, नहीं अब शबाब है |

संसार में नहीं मिला दामन किसी का’ साफ
प्रत्येक चेहरा ढका, काला नकाब है |

इलज़ाम जो लगाया’ है’ उसका सबूत क्या
हिस्सा नही मिला यही केवल इताब है |

वह्काना’ बारदात घटित होती जीस्त में
यह जिंदगी सदैव दिखाती सराब है |

उजला धवल निशा में’ दिखाती अपूर्व रूप
यह वस्त्र पहनी’ है जो’ धरा माहताब है |

दुल्हन बनी रिझा रही’ आशिक है’ बावला
ये खूशबू-ए-रंग लगे ज्यों गुलाब है |

दुनिया में खौफ है विघटन का सही वजह
कोई डरा तो’ कोई’ निडर बेहिसाब है | | 

कालीपद'प्रसाद'    

Thursday, 11 May 2017

दोहे

, गौतम बुद्ध के मूल उपदेश चार दोहे में ( एक प्रयास )
********************************
जाति क्षेत्र के नाम से, समाज को ना बाँट
धर्म पन्थ भाषा नहीं, दोष गुणों पर छाँट |

समता ममता सब रहे, भाव भावना मूल
एक बद्ध कर चेतना,  भेद भाव है शूल |

तृष्णा इच्छा मूल है, कारण सब दुख दर्द
दीप स्वयं अपना बनो, और बनो हमदर्द |

जीव कामना शून्य हो, अहंकार मिट जाय
शील प्रज्ञा साधना, समाधि एक उपाय |***

नाच गान जो भी किया, मानव सभी प्रकार
कीर्तन जैसा गान में, है आनंद अपार |


कालीपद ‘प्रसाद’

Sunday, 7 May 2017

ग़ज़ल

पाक माना धूर्त है, चालाकी’ दिखलायेंगे’ क्या
देश के गद्दारों’ को, फिर पाक उकसायेंगे’ क्या ?

जान न्यौछावर की’ सैनिक देश रक्षा के लिए
ये सहादत से सियासत नेता’ चमकाएंगे’ क्या ?

चाहते थे वे कहे कुछ मोहनी बात और भी
जुमले’ बाजी से नहीं फुर्सत तो बतलायेंगे’ क्या ?

खुद की’ नाकामी छुपाने के लिए कुछ बोलते
भड़की’ है जनता अभी तलक और भड्कायेंगे’ क्या ?

सीमा’ से आतंक वादी चोर ज्यों अन्दर घुसे
तार काँटे तेज हद पर और लगवाएंगे’ क्या ?

आयुधों का डर दिखाकर कब तलक सुरक्षित रकीब
हम खड़े हैं युद्ध स्थल पर मस्त, घबराएंगे’ क्या ?

कालीपद 'प्रसाद'

Friday, 5 May 2017

सुचना

नमस्कार मित्रो ! मेरे ब्लॉग का URL जब से http से https हो गया है (AUTOMATIC) तब से dashboard नहीं खुल रहा है |इस कारण मैं  किसी  की  भी  रचना पढ़ नहीं पा रहा हूँ और न टिप्पणी दे पा रहा हूँ | क्या कोई मुझे मदत कर सकता है ताकि डैशबोर्ड फिर से खुलने लगे |

सादर
कालीपद 'प्रसाद'

लावणी छंद पर आधारित

छोड़ गए क्यों बालम मुझको, राह कौन अब दिखलाए
बच्चे हैं सब छोटे छोटे, उनको कैसे समझाए ?

कौन निर्दयी धोखा देकर, मेरे सिंदूर छिन लिया
पापा पापा चिल्लाये जब, बच्चों को क्या बतलाये ?

स्वदेश की रक्षा की खातिर, तैनात हुए सरहद पर
उनसे ऐसा बर्बरता क्यों, रहनुमा हमें समझाए |

होते गर मंत्री के रिश्ते, निंदा करके चुप होते ?
तब क्या होता जानते सभी, हमसे सच को न छुपाए |

“बलिदान न बेकार जायगा”, ये वादा है न तुम्हारा?
भारती की  आँसू पोंछने, बदला लेकर दिखलाए | 

कालीपद 'प्रसाद'

Thursday, 4 May 2017

ग़ज़ल

आज़ाद हैं यहाँ सभी’ उल्फत ही’ क्यूँ न हो
पावंदी’ भी को’ई नहीं’ तुहमत ही’ क्यूँ न हो |

मिलते सभी गले ही’ अदावत ही’ क्यूँ न हो
दिल से नहीं हबीब मुहब्बत ही’ क्यूँ न हो |

हर देश द्रोही’ जिसने’ किया धोखा’ देश से
गद्दार को सज़ा मिले हिजरत ही’ क्यूँ न हो |

तक़दीर क्या हनोज़ तजुर्बा हुआ नहीं
कुछ तो मिले नसीब, क़यामत ही’ क्यूँ न हो |

फैले हैं हाथ भक्त के’ दृग सामने तेरे
कुछ तो मिले अदीम, हकारत ही’ क्यूँ न हो |

अनुराग यदि पसंद नहीं, बावफा मेरी  
जलवत नसीब में नहीं’, खल्वत ही’ क्यूँ न हो |

गफलत भरा रिवाजें’ सभी दर्दनाक जो
कर त्याग सभी को’ रिवायत ही’ क्यूँ न हो |

कालीपद 'प्रसाद'

Thursday, 27 April 2017

ग़ज़ल

वो अश्क भरा चश्म, समुन्दर न हुआ था
उस दीद से’ दिल भर गया’, पर तर न हुआ था |
तू दोस्त बना मेरा’ चुराकर न हुआ था
संसार कहे कुछ भी’ सितमगर न हुआ था |
वर्षों से’ नहीं हम मिले’, यह एक फसाना
खिंचाव कभी कुछ कहीं’, जर्जर न हुआ था |
हर बार नयन से गिरे’ आँसू, मिले’ जब हम
वो अश्रु हमारा कभी’, गौहर न हुआ था |
दुनिया ने’ किया ज़ुल्म, निखारा सभी’ सद गुण
हम भी बने’ मज़बूत, सिकंदर न हुआ था |
वो गर्म निगाहें तेरी’, कहती थी’ फ़साने
 शोला जगा’ जब दिल में’ तो’ अवसर न हुआ था |
वो सुरमई’ आखें बड़ी’, औ गाल में’ कृष तिल
सब याद है’ मुझको, कभी’ कमतर न हुआ था |
गौहर –मोती
कालीपद ‘प्रसाद’

Thursday, 6 April 2017

ग़ज़ल


बिन तेरे जिंदगी में’ पहरेदार भी नहीं
दुनिया में’ अब किसी से’ मुझे प्यार भी नहीं |

बेइश्क जिंदगी नहीं’ आसान है यहाँ  
इस मर्ज़ की दवा मिले’ आसार भी नहीं |

कटती नहीं निशा ते’रे’ दीदार के बिना
दीदार और का कभी’ स्वीकार भी नहीं |

अब काटना है उम्र ख़ुशी हो या’ गम सनम
तू याद में बसेगी’ तो’ दुश्वार भी नहीं |

अनजान देश में कभी’ तुम यदि उदास हो
सन्देश किस तरह मिले’ अखबार भी नहीं |

दीवानगी 'प्रसाद' पे’ वहशत की हद हुई
अब वेदना का’ को’ई’ भी आजार भी नहीं |

दिल से अगर कभी कभी’ मिलता नहीं है’ दिल
समझौता’ मायने नहीं’ तकरार भी नहीं |

इनकी कला बखान करूँ क्या खुदा बता
लड़ते हैं’ और हाथ में’ तलवार भी नहीं |( गिरह )

शब्दार्थ
दुश्वार –मुश्किल ;  आजार – दुःख/दर्द का स्वाद
वहशत – पागलपन /भय

कालीपद ‘प्रसाद’